Sunday, 27 June 2010
अंतर्राष्ट्रीय सीमा
भारत और पाकिस्तान की चमलियाल स्थित जीरो लाइन. यह अंतर्राष्ट्रीय सीमा है. बांध पर पाकिस्तान के रेंजर मुस्तैद हैं. सामने बी एस एफ के सैनिक.
हमारे पाक क़दमों के निशां
तुम्हारी जमीं पर पड़े हैं
नीयत तुम्हारी जान ली
देखो फिर भी हम अड़े हैं
तुम्हारे दरख़्त लहलहायें
याद रख इधर उसकी जड़ें हैं
क़द्र करना सीख नेक बन
हर मोड़ पड़ हम तुमसे बड़े हैं.
Wednesday, 21 April 2010
अगर मेरे पास पैसा होता
अगर मेरे पास पैसा होता
कुछ चमचों को लेकर दौड़ते
समाज कल्याण की बातें करते
आश्वशनों का झुनझुना बजाते
झूठ बोलते, मैं भी नेता होता.
अगर मेरे पास पैसा होता .
गरीबों को खाना दूंगा
बेरोजगारों को नौकरी दूंगा
बेघर का घर बनवाऊंगा
वादे करके, मैं भी नेता बनता
अगर मेरे पास पैसा होता .
प्यासे मन को पानी देकर
भूखों को दाना-खाना देकर
चमचों की जेबें भरकर
सपने दिखाकर, मैं भी नेता बनता
अगर मेरे पास पैसा होता .
कुछ चमचों को लेकर दौड़ते
समाज कल्याण की बातें करते
आश्वशनों का झुनझुना बजाते
झूठ बोलते, मैं भी नेता होता.
अगर मेरे पास पैसा होता .
गरीबों को खाना दूंगा
बेरोजगारों को नौकरी दूंगा
बेघर का घर बनवाऊंगा
वादे करके, मैं भी नेता बनता
अगर मेरे पास पैसा होता .
प्यासे मन को पानी देकर
भूखों को दाना-खाना देकर
चमचों की जेबें भरकर
सपने दिखाकर, मैं भी नेता बनता
अगर मेरे पास पैसा होता .
Thursday, 1 April 2010
आज और कल
उस समय
छात्र जीवन में
धराधर जवाब देने वाला
मेरा सहपाठी
और निरूत्तर मैं,
- शर्म आती थी .
कॉलेज के ज़माने में
हर विधा में दे देता व्याख्यान
मेरा क्लासमेट
वहां भी मौन
मैं मूढ़
तब भी -
- शर्म आती थी.
दफ्तर में
बॉस का प्रियपात्र
बना मेरा सहकर्मी
कार्यकुशल कहलाता
मैं - घोषित अकार्यकुशल,
- शर्म आती थी.
लेकिन,
मैं चौंकता रहा हूँ -
सहपाठियों, क्लामेटों और सहकर्मियों को
जब-जब आया
मेरा बेहतर परीक्षा परिणाम
प्रबंधन ने दिया बेस्ट सर्विस का इनाम.
और, तब
लोगों ने महसूसा
मेरे चिंतनशील मन और गतिशील तन को.
आज शर्म नहीं आयी.
लेकिन,
उनको क्यों नहीं आती शर्म
जो टंगने वाले हैं दीवारों पर
दिन-दो-दिन बाद
चढ़ेंगे उन पर पुष्पाहार
लेकिन पुष्पाहार चढाने वाले हाथ
होंगे अबोध और अज्ञान
उन्हें - नहीं आती शर्म.
मुझे मालूम है
मैं भी टंग जाऊंगा एक दिन दीवारों पर
मुझ पर भी चढ़ेंगे पुष्पाहार
लेकिन वो हाथ होंगे
मेरी चिंतन और मेरी मेहनत की उपज
मुझसे बहुत बड़े ...
उस दिन -
दीवार पर टंगी मेरी तस्वीर
मुस्कराती नज़र आयेगी.
छात्र जीवन में
धराधर जवाब देने वाला
मेरा सहपाठी
और निरूत्तर मैं,
- शर्म आती थी .
कॉलेज के ज़माने में
हर विधा में दे देता व्याख्यान
मेरा क्लासमेट
वहां भी मौन
मैं मूढ़
तब भी -
- शर्म आती थी.
दफ्तर में
बॉस का प्रियपात्र
बना मेरा सहकर्मी
कार्यकुशल कहलाता
मैं - घोषित अकार्यकुशल,
- शर्म आती थी.
लेकिन,
मैं चौंकता रहा हूँ -
सहपाठियों, क्लामेटों और सहकर्मियों को
जब-जब आया
मेरा बेहतर परीक्षा परिणाम
प्रबंधन ने दिया बेस्ट सर्विस का इनाम.
और, तब
लोगों ने महसूसा
मेरे चिंतनशील मन और गतिशील तन को.
आज शर्म नहीं आयी.
लेकिन,
उनको क्यों नहीं आती शर्म
जो टंगने वाले हैं दीवारों पर
दिन-दो-दिन बाद
चढ़ेंगे उन पर पुष्पाहार
लेकिन पुष्पाहार चढाने वाले हाथ
होंगे अबोध और अज्ञान
उन्हें - नहीं आती शर्म.
मुझे मालूम है
मैं भी टंग जाऊंगा एक दिन दीवारों पर
मुझ पर भी चढ़ेंगे पुष्पाहार
लेकिन वो हाथ होंगे
मेरी चिंतन और मेरी मेहनत की उपज
मुझसे बहुत बड़े ...
उस दिन -
दीवार पर टंगी मेरी तस्वीर
मुस्कराती नज़र आयेगी.
Tuesday, 16 March 2010
फासले
फिर वही समंदर
वही बड़ी मछली
और छोटी मछली
जारी है सिलसिला
खाने और निगलने का
ये और बात है
कि गोरे चले गए, पर
अगड़ा तो है पिछड़ो के लिए
उंच तो है नीच के लिए
मोटे हैं दुबले के लिए
समंदर की वही स्थिति है
बड़ी व्हेल का राज है
सब कुछ जानती है छोटी मछली
तड़प रही है, फंस रही है.
खाई-पचाई जा रही है.
वही बड़ी मछली
और छोटी मछली
जारी है सिलसिला
खाने और निगलने का
ये और बात है
कि गोरे चले गए, पर
अगड़ा तो है पिछड़ो के लिए
उंच तो है नीच के लिए
मोटे हैं दुबले के लिए
समंदर की वही स्थिति है
बड़ी व्हेल का राज है
सब कुछ जानती है छोटी मछली
तड़प रही है, फंस रही है.
खाई-पचाई जा रही है.
Sunday, 7 March 2010
मेरी मां
मुझे खिलाने के बाद
चुपके से जाकर सो गयी
कटोरी भरकर दूध दी थी मुझे
बोली, मैं पी चुकी इसलिए कम रह गयी
वह बिस्तर पर खांस रही थी
मैं करवटें बदल रहा था.
मुझे मालूम है
मां आज फिर झूठ बोल गयी.
चुपके से जाकर सो गयी
कटोरी भरकर दूध दी थी मुझे
बोली, मैं पी चुकी इसलिए कम रह गयी
वह बिस्तर पर खांस रही थी
मैं करवटें बदल रहा था.
मुझे मालूम है
मां आज फिर झूठ बोल गयी.
Saturday, 13 February 2010
तुम और मैं
बात-बात पर धमकी
और फटकार
सो-कोज के बाद
जारी तकरार
रोजनामचे में शामिल
उनका व्यवहार .
ये कैसे हो गया
वो कैसे हो गया
हमसे पूछ तो लेते
कह कर तो जाते
मुझे पसंद नहीं -
आगे से ऐसा नहीं चलेगा.
अपने को तो आदत है
ऐसे ही होता स्वागत है.
मेरी हाँ में हाँ मिलाना
तुमसे ही है ज़माना
बस यूं ही निहारता रहूँ
यूं डूबता रहूँ उतरता रहूँ
फिर मेरा कदम बढ़ाना
मेरी आदत है उकताना.
उसने भी है ठाना
पहले थोड़ा सकुचाना
फिर देह का चुराना
हंसी-ठट्ठे के बाद
एकाकार हो जाना
सारे रंजो गम भुलाकर
मुझको गले लगाकर
आँखें मूँद लेना
थोड़ी ही देर बाद
निंदिया के पास जाना
अपुन की ज़िंदगी है
ऐसे ही चलती है.
और फटकार
सो-कोज के बाद
जारी तकरार
रोजनामचे में शामिल
उनका व्यवहार .
ये कैसे हो गया
वो कैसे हो गया
हमसे पूछ तो लेते
कह कर तो जाते
मुझे पसंद नहीं -
आगे से ऐसा नहीं चलेगा.
अपने को तो आदत है
ऐसे ही होता स्वागत है.
मेरी हाँ में हाँ मिलाना
तुमसे ही है ज़माना
बस यूं ही निहारता रहूँ
यूं डूबता रहूँ उतरता रहूँ
फिर मेरा कदम बढ़ाना
मेरी आदत है उकताना.
उसने भी है ठाना
पहले थोड़ा सकुचाना
फिर देह का चुराना
हंसी-ठट्ठे के बाद
एकाकार हो जाना
सारे रंजो गम भुलाकर
मुझको गले लगाकर
आँखें मूँद लेना
थोड़ी ही देर बाद
निंदिया के पास जाना
अपुन की ज़िंदगी है
ऐसे ही चलती है.
Tuesday, 9 February 2010
नज़्म
ज़माना बदल रहा है ये और बात है.
बेलौस हैं मेरे कदम ये और बात है.
आसमां नापती है सैर करती है चिड़िया
लौट आती दरख़्त पर ये और बात है.
मेरे परवाज की परवाह क्यों करे कोई
चुभती है उड़ान उन्हें ये और बात है.
तुम्हारे कदम नपे-तुले नज़र सधी हुई
डगमगा रहा मैं बीच राह ये और बात है.
मेरी रफ़्तार पर न कर जहमते सौदागरी
खाके ठोकर संभलते हैं ये और बात है.
सरेबाजार मोल लगा भाव तय किये
न आया खरीदार कोई ये और बात है.
आ चल मेरे साथ मेरी आँख देख
नजाकत सिर्फ यहीं ये और बात है.
बेलौस हैं मेरे कदम ये और बात है.
आसमां नापती है सैर करती है चिड़िया
लौट आती दरख़्त पर ये और बात है.
मेरे परवाज की परवाह क्यों करे कोई
चुभती है उड़ान उन्हें ये और बात है.
तुम्हारे कदम नपे-तुले नज़र सधी हुई
डगमगा रहा मैं बीच राह ये और बात है.
मेरी रफ़्तार पर न कर जहमते सौदागरी
खाके ठोकर संभलते हैं ये और बात है.
सरेबाजार मोल लगा भाव तय किये
न आया खरीदार कोई ये और बात है.
आ चल मेरे साथ मेरी आँख देख
नजाकत सिर्फ यहीं ये और बात है.
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बेटी पूछती है
गुड़िया क्यों न खेले गुड्डों का सारा खेल, बेटी पूछती है हरदम क्यों नाप-जोख, क्यों हमारा मेल, बेटी पूछती है मैंने भी ढोए उतने ह...
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मानता हूँ कि सही आकर के लिए लोहे को खूब तपाया जाता है, फिर पीटा भी जाता है। छोटे-बड़े तरह-तरह के - हथोड़े का दर्द पिलाया जाता है। अच्छा होता...
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पथ बदलते हैं हम और आप सभी घर बदलने के लिए घर सँवारने के लिए घर सजाने के लिए और अच्छे ठिकाने की चाहत में रास्ते आड़े हों रास्ते तिरछे ...
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महाभारत फ़िर से दुहरा रहा है कौरव - पांडव में झमेला खड़ा है आधुनिक महाभारत काल - और अल्पसंख्यक पांडवों की जोर पकड़ती आरक्षण की मा...