Sunday, 8 March 2026

सत्तांतरण

 

समाजवाद की अर्थी पर वंशवाद के पुष्प चढ़ाएं

आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं

 

तुम तेजस्वी हो, तुम प्रदीप्त चिराग

रामनाथ, तुझमें अखिलेश का राग

नतमस्तक हैं दरबारी सब, मिलकर चारण गाएं

आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं

 

लोकतंत्र पर क्यों करनी बात

समाजवाद अब कल की बात

उत्तराधिकार तुम्हें अर्पित, आ जाओ सम्राट बनाएं

आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं

 

तख्त संभालो, ताज संभालो

खानदान की तुम लाज संभालो

जातिवाद का गणित सिखा, तुमको राजनीतिज्ञ बनाएं

आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं

Saturday, 21 June 2025

 गजल

 

पूरी नजर से अधूरा घर देखता हूं।

गांवों में अधबसा शहर देखता हूं।

 

पूरे सपने बुने, अधूरे हासिल हुए।

फिर-फिर मैं अपने हुनर देखता हूं।

 

जिंदगी आधी कटी, पूरे तूफां आए।

कितनी ऊंची उठी लहर देखता हूं।

 

भरोसा की पूरी जमीं, फसल अधूरी।

किसने बो दिए यहां जहर देखता हूं।

 

अधूरा जान कर लिखी पूरी गजल।

कितना सही बैठा बहर देखता हूं।

Friday, 31 March 2023

 क्या हो जाता गर

दिल खोल लेने देते
जीभर बोल लेने देते
मन की कह लेने देते
उनका इजहार हो जाता
आपका इनकार हो जाता
क्या हो जाता गर
कटवा लेते जरा चिकोटी
सुन लेते उनकी जली-कटी
दिल-दिल की खरी-खोटी
जोराजोरी बातों की हो जाती
सरगोशी भरे बाजार हो जाती
क्या हो जाता गर
वो कह देते जा-बेवफा आपको
अक्स आईने में दिखा देते आपको
यूं भी वफा से कब वफा आपको
मोहब्बत की हिमाकत कर लेने देते
आरजू-मिन्नतों का दौर चला लेने देते
क्या हो जाता गर…

Friday, 30 September 2022

 पिता हूं


तलहटी में बचे तालाब के थोड़े से पानी

भागती जिंदगी में बची थोड़ी सी जवानी

दोनों को समेटकर सींचता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

 

आती हुई झर्रियों को छुपाने की जुगत में

वक्त ने जो बख्शी, उतनी-सी मुरव्वत में

देखो, मैं बेहिसाब दौड़ता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

 

बस्ता, कपड़े, टिफिन, फीस से भी आगे

वक्त से कदमताल के लिए देर से जागे

इसलिए अब तेज भागता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

Tuesday, 12 October 2021

 पीड़ित क्रांति


क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल

सुना, घर छोड़ गया जो बेटा था वाचाल

 

तर्पण तुम्हारे विचारों का कर दिया

अवशेष फल्गु की धारा में बहा दिया

आखिरी लाल सलाम भी कह दिया

 

उखड़ा पैबंद, तुम फिर हुई फटेहाल

क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल

 

छोड़ गया वो छोरा तुमको बीच धार

नहीं हो सकी नवोन्माद की नैया पार

फंसी थी, फंसी रह गई तुम मझधार

 

ऐसे क्यूं बदला लेनिनग्राद का लाल

क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल

 

अपने घर में हारा तो घर ही तोड़ गया

कैसा लड़ाका! डंडा-झंडा छोड़ गया

बदल विचारों को सारी धारा मोड़ गया

 

तेरे इंकलाब का यह असमय इंतकाल

क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल

Wednesday, 8 September 2021

 

चांद, तारे, फूल, शबनम

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चांद, जिस पर मैं गया नहीं

जिसे मैंने कभी छुआ नहीं

उजले-काले रंगों वाला-

जो दिन में कभी दिखा नहीं

 

चांद तुम्हें मैं कैसे कह दूं

गलतबयानी मैं कैसे कर दूं

 

तारे, दूर गगन में रहते हैं

मुट्ठी में कभी न आते हैं

दूर बहुत उसकी टिमटिम

पौ फटते ही गुम जाते हैं

 

तारे तुमको कैसे लाकर दूं

गलतबयानी में कैसे कर दूं

 

फूल, इतने सारे गुलशन में

अजग-गजब के महक चमन में

इतने-इतने रंगों में है मिलता

मैं भटक गया हूं इस उपवन में

 

फूल तुम्हें मैं खत में क्यों भेजूं

गलतबयानी में कैसे कर दूं

 

शबनम, इन बूंदों की क्या बिसात

तुम, तुम हो इसकी क्या औकात

मौसम का मारा रहता ये खुद ही

इससे कब बननी अपनी बात

 

शबनम के माफिक क्यों लिख दूं

गलतबयानी मैं कैसे कर दूं

Wednesday, 3 March 2021

 

ओ कवि!

ओ कवि!

कुछ और रचो।

शब्द बहुत लिखे,

भाव भी उड़ेले।

 

देखो तो!

शब्द-भाव के हाल।

एक सहमा-सा,

दूजा बेजान-सा।

 

कविराज!

अर्थ पर आओ।

किसी को चुभे नहीं,

भवें कहीं तने नहीं।

 

नहीं मानोगे!

तो लिख डालो।

न डरे हैं, न डरेंगे

मेरे शब्द चुभेंगे।

सत्तांतरण   समाजवाद की अर्थी पर वंशवाद के पुष्प चढ़ाएं आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं   तुम तेजस्वी हो, तुम प्रदीप्त ...