देश के दादा चाह रहे
छीनें दीदी का बंगाल
छीनें दीदी का बंगाल,
करें उनको कंगाल
करें उनको कंगाल,
कमल हो मालामाल
फिर कहेंगे दादा, मेरा हुआ दीदी का बंगाल
मुझे अच्छी लगती है... शब्दों की दुनिया
देश के दादा चाह रहे
छीनें दीदी का बंगाल
छीनें दीदी का बंगाल,
करें उनको कंगाल
करें उनको कंगाल,
कमल हो मालामाल
फिर कहेंगे दादा, मेरा हुआ दीदी का बंगाल
दुनिया के दादा बचके,
गोली चल रही है
टेबल के नीचे जा घुसिए,
गोली चल रही है
दुनियाभर में भले
आपकी बोली चल रही है
घर में ही आपके, मगर
गोली चल रही है
तलवे चाट रहा अपना
छुटकुन पाकिस्तान
उसको तो पैसे से मतलब
बेच रहा है ईमान
बम फोड़ रहे आप मर
रहे नाहक ही इंसान
बचा कौन है, ना ईरान,
ना अफगानिस्तान
पश्चिम के गोले से
आई है पूरब में आफत
पूरब में आई आफत तो
कैसे आप अनाहत
बड़े जंगजू आप, चाहत
में है तेल की राहत
दादा कैसे बने रहोगे
जब पूरी दुनिया आहत
दुनिया के दादा बचके,
गोली चल रही है
टेबल के नीचे जा घुसिए,
गोली चल रही है
बना चौधरी छुटकुन
अपना टेबल दिया सजाय
टेबल दिया सजाय, बैठा
पलक पांवड़े बिछाय
शांति खोजने पूरब
आया, ताल ठोकने पश्चिम
बना चौधरी छुटकुन
अपना टेबल दिया सजाय
किस मुल्क से लकड़ी
आई और कहां से इशारा
मेजपोश किसने दी,
छुटकुन ने कैसे खूंटा गाड़ा
बंद कमरे में एक-दूजे
के सम्मुख दिया बिठाय
बना चौधरी छुटकुन
अपना टेबल दिया सजाय
छुटकुन दोनों को साध
रहा, उड़कर आए बेचारे
एक, आंख में आंसू
लेकर, दूजा ले आया अंगारे
दोनों अपने-अपने घर
लौटे सबको ठेंगा दिखाय
बना चौधरी छुटकुन
अपना टेबल दिया सजाय
पहली बार गेरूआ सरदार
देखेगी पुरानी सरकार
सूबे की सत्ता में
लिखेगी अब नई कहानी सरकार
पाटलिपुत्र की गद्दी
पर आये हैं अब सम्राट नये
सुशासन की अब नई-नई छोड़िए निशानी सरकार
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सुशासन के नये खेवैया,
सम्राट रहेंगे पटना में
तीर गिरा दिल्ली जाकर,
खिला कमल पटना में
खिला कमल पटना में, डबल इंजन की सरकार
बदलेगा गणित सियासत का नये सिरे से पटना में
सत्तांतरण
समाजवाद की अर्थी पर वंशवाद के पुष्प चढ़ाएं
आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं
तुम तेजस्वी हो, तुम प्रदीप्त चिराग
रामनाथ, तुझमें अखिलेश का राग
नतमस्तक हैं दरबारी सब, मिलकर चारण गाएं
आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं
लोकतंत्र पर क्यों करनी बात
समाजवाद अब कल की बात
उत्तराधिकार तुम्हें अर्पित, आ जाओ सम्राट बनाएं
आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं
तख्त संभालो, ताज संभालो
खानदान की तुम लाज संभालो
जातिवाद का गणित सिखा, तुमको राजनीतिज्ञ बनाएं
आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं
पूरी
नजर से अधूरा घर देखता हूं।
गांवों
में अधबसा शहर देखता हूं।
पूरे
सपने बुने, अधूरे हासिल हुए।
फिर-फिर
मैं अपने हुनर देखता हूं।
जिंदगी
आधी कटी, पूरे तूफां आए।
कितनी
ऊंची उठी लहर देखता हूं।
भरोसा
की पूरी जमीं, फसल अधूरी।
किसने
बो दिए यहां जहर देखता हूं।
अधूरा
जान कर लिखी पूरी गजल।
कितना
सही बैठा बहर देखता हूं।
क्या हो जाता गर
देश के दादा चाह रहे छीनें दीदी का बंगाल छीनें दीदी का बंगाल, करें उनको कंगाल करें उनको कंगाल, कमल हो मालामाल फिर कहेंगे दादा, मेरा ह...