जरा सा बेईमान
हो लेता तो यूं बेबस नहीं होता
टुकड़ों में बेच
ईमान लेता तो यूं बेबस नहीं होता
हमारी सारी होशियारी
होती रही नीलाम सरेबाजार
सच कहते हैं, मूर्खता
का कोई सिलेबस नहीं होता
मुझे अच्छी लगती है... शब्दों की दुनिया
जरा सा बेईमान
हो लेता तो यूं बेबस नहीं होता
टुकड़ों में बेच
ईमान लेता तो यूं बेबस नहीं होता
हमारी सारी होशियारी
होती रही नीलाम सरेबाजार
सच कहते हैं, मूर्खता
का कोई सिलेबस नहीं होता
कमाई उम्रभर की कहां
रखी, बेटा पूछता है
बनाई जो मिल्कियत
गई कहां, बेटा पूछता है
ढली उमरिया आपकी,
चढ़ी मेरी जवानी है
लिखा क्या अपनी वसीयत
में, बेटा पूछता है
मेरे सपनों का सारा
दारोमदार टिका आप पर
पूरे आपकी सोहबत में
होंगे ना, बेटा पूछता है
बिताई आपने भी होगी
जवानी अपनी मर्जी से
मुझे टोकने की क्यों
है जरूरत, बेटा पूछता है
सोचता हूं मैं किससे
पूछूं किसकी मर्जी रही
नहीं मुझमें जरा भी
हिम्मत मगर, बेटा पूछता है
तुम दुबली रही, मेरा
मोटापा आ गया
उम्र पर दोनों की
बढ़ी,
आंखों के दरमियां
ये चश्मा आ गया
तुम शांत थी, अब गुस्सैल
हो चली
लाजिमी था यह होना,
दवा भी होमियो से
एलोपैथ हो चली
इश्क करूंगा जीभर
कर देख लेना, देख लेना
फेरे भी लूंगा पूरे
सात, गिन लेना तुम गिन लेना
एक निवेदन तुमसे है
प्रिये, फेरे से पहले तुम-
लोहागढ़ किले से न
धकेल देना न धकेल देना
लहरें आती ही हैं
साहिल को समा लेने की खातिर
समंदर, तुम तो हमेशा
से साम्राज्यवादी रहे हो
अपने पाट को और चौड़ा
करने की जुगत रहती है
पश्चिम ही नहीं पूरब
में भी विस्तारवादी रहे हो
जगह एक है और जिला
यह महापुरुषों का धाम
इनकी प्रतिमा, उनकी
मूर्ति से बिगड़ेंगे सारे काम
फेंको सारी पर्ची,
जिसमें लिखे नाम और उपनाम
बनवा दो पुष्ट वाटिका
फिर गूंथो माला सबके नाम
प्यार-मोहब्बत और
इश्क-विश्क, जाने दो
भूख लगी है हमको,
पहले रोटी खाने दो
दल-बदल और टूट-फूट
की बातें हैं सियासी
छोड़ो इन बातों को,
धंधे पर ध्यान लगाने दो
बादल गरजे, पर बरसे
नहीं, सूखे हैं खेत
धीरज धरो कुछ दिन,
सावन को आने दो
कसमें-वादे मैं करता
नहीं अब भूले से
चौखट पर अंधियारा
है, इसको छंट जाने दो
छूटे हैं जितने काम
मेरे, सब करेंगे बाद में
भूख लगी है हमको,
पहले रोटी खाने दो
परीक्षा के लिए परीक्षा
ले रहे दिल्ली के प्रधान
कहते हैं कि इस मसले
पर नजर गड़ाए हुए हैं साहब
शिव को सत्ता क्योंकि
ले बैठे थे हेमंता की भांति कत्ता
देख लिया गुवाहाटी,
बेंगलुरू और देखा है कलकत्ता
राजस्थान के परेशान
पायलट का पर खुल न पाया पत्ता
बशीर बद्र की याद
में-
अगर तलाश करूं तो
कोई मिल ही जाएगा
मगर तुम्हारी तरह
हमें गजलें कौन सुनाएगा
बढ़े तेल के दाम, फिर छाने लगी महंगाई
छाने लगी महंगाई, छूटेगी सबकी रुलाई
डायन ने फिर दी है दस्तक, जाएगी खाय
जाएगी खाय, हाय फिर छाने लगी महंगाई
जंग छिड़ी उनके घर, पर जेब जली हमारी
जेब जली ऐसी कि लुट जाएगी बचत सारी
कंटनी-छंटनी का दौर आएगा, क्या करेंगे?
क्या करेंगे, यह महंगाई भी अब पड़ेगी भारी
कॉकरोच सब जमा हुए, पर क्या कर लेंगे
क्या कर लेंगे, ये बेरोजगार क्या हमको देंगे
हमको देंगे क्या जो सोशल मीडिया पर आए
सोशल मीडिया से क्या कीमत में राहत देंगे
जरा सा बेईमान हो लेता तो यूं बेबस नहीं होता टुकड़ों में बेच ईमान लेता तो यूं बेबस नहीं होता हमारी सारी होशियारी होती रही नीलाम सरे...