Thursday, 16 April 2026

छुटकुन

 


बना चौधरी छुटकुन अपना टेबल दिया सजाय

टेबल दिया सजाय, बैठा पलक पांवड़े बिछाय

शांति खोजने पूरब आया, ताल ठोकने पश्चिम

बना चौधरी छुटकुन अपना टेबल दिया सजाय

 

किस मुल्क से लकड़ी आई और कहां से इशारा

मेजपोश किसने दी, छुटकुन ने कैसे खूंटा गाड़ा

बंद कमरे में एक-दूजे के सम्मुख दिया बिठाय

बना चौधरी छुटकुन अपना टेबल दिया सजाय

 

छुटकुन दोनों को साध रहा, उड़कर आए बेचारे

एक, आंख में आंसू लेकर, दूजा ले आया अंगारे

दोनों अपने-अपने घर लौटे सबको ठेंगा दिखाय

बना चौधरी छुटकुन अपना टेबल दिया सजाय

Wednesday, 15 April 2026

बिहार की राजनीति


 




पहली बार गेरूआ सरदार देखेगी पुरानी सरकार

सूबे की सत्ता में लिखेगी अब नई कहानी सरकार

पाटलिपुत्र की गद्दी पर आये हैं अब सम्राट नये

सुशासन की अब नई-नई छोड़िए निशानी सरकार

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सुशासन के नये खेवैया, सम्राट रहेंगे पटना में

तीर गिरा दिल्ली जाकर, खिला कमल पटना में

खिला कमल पटना में, डबल इंजन की सरकार

बदलेगा गणित सियासत का नये सिरे से पटना में

Sunday, 8 March 2026

सत्तांतरण

 

समाजवाद की अर्थी पर वंशवाद के पुष्प चढ़ाएं

आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं

 

तुम तेजस्वी हो, तुम प्रदीप्त चिराग

रामनाथ, तुझमें अखिलेश का राग

नतमस्तक हैं दरबारी सब, मिलकर चारण गाएं

आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं

 

लोकतंत्र पर क्यों करनी बात

समाजवाद अब कल की बात

उत्तराधिकार तुम्हें अर्पित, आ जाओ सम्राट बनाएं

आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं

 

तख्त संभालो, ताज संभालो

खानदान की तुम लाज संभालो

जातिवाद का गणित सिखा, तुमको राजनीतिज्ञ बनाएं

आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं

Saturday, 21 June 2025

गजल


 गजल

 

पूरी नजर से अधूरा घर देखता हूं।

गांवों में अधबसा शहर देखता हूं।

 

पूरे सपने बुने, अधूरे हासिल हुए।

फिर-फिर मैं अपने हुनर देखता हूं।

 

जिंदगी आधी कटी, पूरे तूफां आए।

कितनी ऊंची उठी लहर देखता हूं।

 

भरोसा की पूरी जमीं, फसल अधूरी।

किसने बो दिए यहां जहर देखता हूं।

 

अधूरा जान कर लिखी पूरी गजल।

कितना सही बैठा बहर देखता हूं।

Friday, 31 March 2023

 क्या हो जाता गर

दिल खोल लेने देते
जीभर बोल लेने देते
मन की कह लेने देते
उनका इजहार हो जाता
आपका इनकार हो जाता
क्या हो जाता गर
कटवा लेते जरा चिकोटी
सुन लेते उनकी जली-कटी
दिल-दिल की खरी-खोटी
जोराजोरी बातों की हो जाती
सरगोशी भरे बाजार हो जाती
क्या हो जाता गर
वो कह देते जा-बेवफा आपको
अक्स आईने में दिखा देते आपको
यूं भी वफा से कब वफा आपको
मोहब्बत की हिमाकत कर लेने देते
आरजू-मिन्नतों का दौर चला लेने देते
क्या हो जाता गर…

Friday, 30 September 2022

पिता

 पिता



तलहटी में बचे तालाब के थोड़े से पानी

भागती जिंदगी में बची थोड़ी सी जवानी

दोनों को समेटकर सींचता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

 

आती हुई झर्रियों को छुपाने की जुगत में

वक्त ने जो बख्शी, उतनी-सी मुरव्वत में

देखो, मैं बेहिसाब दौड़ता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

 

बस्ता, कपड़े, टिफिन, फीस से भी आगे

वक्त से कदमताल के लिए देर से जागे

इसलिए अब तेज भागता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

Tuesday, 12 October 2021

क्रांति


क्रांति


क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल

सुना, घर छोड़ गया जो बेटा था वाचाल

 

तर्पण तुम्हारे विचारों का कर दिया

अवशेष फल्गु की धारा में बहा दिया

आखिरी लाल सलाम भी कह दिया

 

उखड़ा पैबंद, तुम फिर हुई फटेहाल

क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल

 

छोड़ गया वो छोरा तुमको बीच धार

नहीं हो सकी नवोन्माद की नैया पार

फंसी थी, फंसी रह गई तुम मझधार

 

ऐसे क्यूं बदला लेनिनग्राद का लाल

क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल

 

अपने घर में हारा तो घर ही तोड़ गया

कैसा लड़ाका! डंडा-झंडा छोड़ गया

बदल विचारों को सारी धारा मोड़ गया

 

तेरे इंकलाब का यह असमय इंतकाल

क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल

छुटकुन

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