Saturday, 1 October 2022

पिता

 पिता



तलहटी में बचे तालाब के थोड़े से पानी

भागती जिंदगी में बची थोड़ी सी जवानी

दोनों को समेटकर सींचता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

 

आती हुई झर्रियों को छुपाने की जुगत में

वक्त ने जो बख्शी, उतनी-सी मुरव्वत में

देखो, मैं बेहिसाब दौड़ता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

 

बस्ता, कपड़े, टिफिन, फीस से भी आगे

वक्त से कदमताल के लिए देर से जागे

इसलिए अब तेज भागता हूं

बड़े हो रहे बच्चों का पिता हूं

बेटी पूछती है

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