Thursday, 9 September 2021

 

चांद, तारे, फूल, शबनम

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चांद, जिस पर मैं गया नहीं

जिसे मैंने कभी छुआ नहीं

उजले-काले रंगों वाला-

जो दिन में कभी दिखा नहीं

 

चांद तुम्हें मैं कैसे कह दूं

गलतबयानी मैं कैसे कर दूं

 

तारे, दूर गगन में रहते हैं

मुट्ठी में कभी न आते हैं

दूर बहुत उसकी टिमटिम

पौ फटते ही गुम जाते हैं

 

तारे तुमको कैसे लाकर दूं

गलतबयानी में कैसे कर दूं

 

फूल, इतने सारे गुलशन में

अजग-गजब के महक चमन में

इतने-इतने रंगों में है मिलता

मैं भटक गया हूं इस उपवन में

 

फूल तुम्हें मैं खत में क्यों भेजूं

गलतबयानी में कैसे कर दूं

 

शबनम, इन बूंदों की क्या बिसात

तुम, तुम हो इसकी क्या औकात

मौसम का मारा रहता ये खुद ही

इससे कब बननी अपनी बात

 

शबनम के माफिक क्यों लिख दूं

गलतबयानी मैं कैसे कर दूं

Thursday, 4 March 2021

 

ओ कवि!

ओ कवि!

कुछ और रचो।

शब्द बहुत लिखे,

भाव भी उड़ेले।

 

देखो तो!

शब्द-भाव के हाल।

एक सहमा-सा,

दूजा बेजान-सा।

 

कविराज!

अर्थ पर आओ।

किसी को चुभे नहीं,

भवें कहीं तने नहीं।

 

नहीं मानोगे!

तो लिख डालो।

न डरे हैं, न डरेंगे

मेरे शब्द चुभेंगे।

Tuesday, 24 December 2019

सत्ता की डगर


वो कोई एक
जो जानता है
 तूफानों से
 खामोशी चुराने का हुनर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

वो कोई एक
जो जानता है
 भरी भीड़ में
 कैसे रहते हैं सबसे इतर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

वो कोई एक
जो जानता है
 मीठे बोल से
 कैसे घोला जाता है जहर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

वो कोई एक
जो जानता है
 कैसे चलेगी
 यहां मेरे नाम की लहर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

वो कोई एक
जो जानता है
 आसान नहीं
 कठिन है सत्ता की डगर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

पर, वो एक है
अब जान गया है
   रहकर सबसे इतर
   खामोशियां चुराकर
   घोलकर जहर
   सहारे नाम की लहर
   सत्ता की डगर
 इस देश में लंबा नहीं चल सकते

Monday, 15 August 2016

गजल



पीयो दूध, छाछ और लस्सी, यहां शराब पीना मना है।
मत खोजो पानी अब रंगीन, यहां शराब पीना मना है।

राजनीति के धाकड़ कहते, हम तो हैं गांधी के हमराह,
रोग नशे का है तो दवा पीयो, यहां शराब पीना मना है।

गांव-गांव में मदिरालय खोल, गांधीछाप जुटाते थे तब
देते अब धर्म की दुहाई, कहते, यहां शराब पीना मना है।

मर जाएंगे, मिट जाएंगे, जो भी गत हो जाए सह लेंगे
कुर्सी का दम भर कहते रहेंगे, यहां शराब पीना मना है।

लिए नगाड़ा, पीट ढिंढोरा, वो घूम रहे हैं नगर-नगर,
हे गांधीचरों अब कह भी दो, यहां शराब पीना मना है।

Saturday, 10 March 2012

मेहनतनामचा

समंदर से हुई
मेरी हर बातचीत में
यह बात तफसील से कही गई
कि -
अबकी साहिल की खैर नहीं
मेरी लहरें आएंगी
और
उलीच ले जाएंगी
किनारे पड़ी रेत
बढ़ जाएगा हमारा दायरा
होता जाएगा मेरा विस्तार
समंदर,
तुम साम्राज्यवादी हो गए हो।

हालांकि,
मैं कहने के साथ-साथ
डरता भी रहा हूं
सहमता भी रहा हूं
हर बूंद असर दिखाती है
फिर तो यह समंदर है।

मगर,
मैं फिर से संभल जाता हूं
बूंद के बाद जब कभी-
बुंदेलखंड याद आ जाया करता है

मैं खुद को ताकीद करता हूं
मत घबराओ, मत घबराओ
बुंदेलखंड से पूर्वांचल
और ओखला तक जाने के बाद भी
थोथा चना भाड़ नहीं फोड़ सका
साम्राज्यवाद पर समाजवाद का विजय
हमें तुष्ट कर देता है!!

इस देश से!

बात वर्षों पुरानी है
इसलिए तुम्हें याद नहीं शायद
राज ऐसे ही बंटता रहा है
पुश्त दर पुश्त
हर मुलायम बेदखल होते हैं
किसी न किसी अखिलेश से
जैसे कोई जवाहर लाल हटे थे
इंदिरा के लिए इस देश से!

Saturday, 19 March 2011

हे राम!

मार्च का महीना
सिर पर इम्तिहान
पेपर है मर्यादा का
असमंजस में हैं राम!

गुरु वशिष्ठ के जमाने में
कठिन नहीं था ज्ञान
आज क्या पढ़ें, पता नहीं
असमंजस में हैं राम!

राजा दशरथ का लाड़ था
पूरी अयोध्या का सम्मान
अब कोई क्यों नहीं पूछता
असमंजस में हैं राम!

अहिल्या का उद्धार किया
सारे जग ने कहा महान
अब कोई अबला नहीं
असमंजस में हैं राम!

मेरा सलाम

  तेल का ज्यादा दाम चुकाए जो दाल-भात सब महंगी खाए जो मेरा सलाम!   मध्यम वर्ग के बचत खातों को निम्न वर्ग के लथपथ हाथों को मेरा सल...