Tuesday, 24 December 2019

सत्ता की डगर


वो कोई एक
जो जानता है
 तूफानों से
 खामोशी चुराने का हुनर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

वो कोई एक
जो जानता है
 भरी भीड़ में
 कैसे रहते हैं सबसे इतर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

वो कोई एक
जो जानता है
 मीठे बोल से
 कैसे घोला जाता है जहर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

वो कोई एक
जो जानता है
 कैसे चलेगी
 यहां मेरे नाम की लहर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

वो कोई एक
जो जानता है
 आसान नहीं
 कठिन है सत्ता की डगर
   वो मैं नहीं
   वो तू नहीं

पर, वो एक है
अब जान गया है
   रहकर सबसे इतर
   खामोशियां चुराकर
   घोलकर जहर
   सहारे नाम की लहर
   सत्ता की डगर
 इस देश में लंबा नहीं चल सकते

Monday, 15 August 2016

गजल



पीयो दूध, छाछ और लस्सी, यहां शराब पीना मना है।
मत खोजो पानी अब रंगीन, यहां शराब पीना मना है।

राजनीति के धाकड़ कहते, हम तो हैं गांधी के हमराह,
रोग नशे का है तो दवा पीयो, यहां शराब पीना मना है।

गांव-गांव में मदिरालय खोल, गांधीछाप जुटाते थे तब
देते अब धर्म की दुहाई, कहते, यहां शराब पीना मना है।

मर जाएंगे, मिट जाएंगे, जो भी गत हो जाए सह लेंगे
कुर्सी का दम भर कहते रहेंगे, यहां शराब पीना मना है।

लिए नगाड़ा, पीट ढिंढोरा, वो घूम रहे हैं नगर-नगर,
हे गांधीचरों अब कह भी दो, यहां शराब पीना मना है।

Saturday, 10 March 2012

मेहनतनामचा

समंदर से हुई
मेरी हर बातचीत में
यह बात तफसील से कही गई
कि -
अबकी साहिल की खैर नहीं
मेरी लहरें आएंगी
और
उलीच ले जाएंगी
किनारे पड़ी रेत
बढ़ जाएगा हमारा दायरा
होता जाएगा मेरा विस्तार
समंदर,
तुम साम्राज्यवादी हो गए हो।

हालांकि,
मैं कहने के साथ-साथ
डरता भी रहा हूं
सहमता भी रहा हूं
हर बूंद असर दिखाती है
फिर तो यह समंदर है।

मगर,
मैं फिर से संभल जाता हूं
बूंद के बाद जब कभी-
बुंदेलखंड याद आ जाया करता है

मैं खुद को ताकीद करता हूं
मत घबराओ, मत घबराओ
बुंदेलखंड से पूर्वांचल
और ओखला तक जाने के बाद भी
थोथा चना भाड़ नहीं फोड़ सका
साम्राज्यवाद पर समाजवाद का विजय
हमें तुष्ट कर देता है!!

इस देश से!

बात वर्षों पुरानी है
इसलिए तुम्हें याद नहीं शायद
राज ऐसे ही बंटता रहा है
पुश्त दर पुश्त
हर मुलायम बेदखल होते हैं
किसी न किसी अखिलेश से
जैसे कोई जवाहर लाल हटे थे
इंदिरा के लिए इस देश से!

Saturday, 19 March 2011

हे राम!

मार्च का महीना
सिर पर इम्तिहान
पेपर है मर्यादा का
असमंजस में हैं राम!

गुरु वशिष्ठ के जमाने में
कठिन नहीं था ज्ञान
आज क्या पढ़ें, पता नहीं
असमंजस में हैं राम!

राजा दशरथ का लाड़ था
पूरी अयोध्या का सम्मान
अब कोई क्यों नहीं पूछता
असमंजस में हैं राम!

अहिल्या का उद्धार किया
सारे जग ने कहा महान
अब कोई अबला नहीं
असमंजस में हैं राम!

Tuesday, 15 February 2011

इंकलाब जिंदाबाद

यह एक अच्छी खबर थी
फर्स्ट पेज की लीड
पूरे आठ कॉलम वाली
फैला कर छाप दी गई

पाठकों ने भी गौर से पढ़ा
साथ में तस्वीर भी देखी
आधे पेज की यह खबर
पढऩे में आधा घंटा लगा दिया

पढ़ाकुओं ने रिकार्ड मैंटेन किया
यह खबर भविष्य में एक सवाल होगी
जवाब याद रखना चाहिए
जाने कब इम्तिहान आ जाए?

वकीलों ने भरपेट चर्चा की
कानून के दांवपेंच के बीच
घटना को जरूरी-गैरजरूरी कहा
साथ में गिना दी कानून की धाराएं

कुछ अफसरशाह मंद-मुद मुस्कराए
खबर पढ़ी और अखबार परे रख दिया
प्रतिक्रिया व्यक्त करने की फुर्सत नहीं थी
किसी से जिक्र तक नहीं किया

नेताओं ने जरूर गौर से पढ़ा
जानने वालों से जिक्र भी किया
क्या हमारे साथ भी ऐसा हो सकता है?
इस मसले पर थोड़ी मगजमारी कर ली

खबर मैंने भी देखी-पढ़ी
मिस्र की इस खबर में कितनी मिठास थी
बरबस मेरे मुंह से निकला-
जनता जनार्दन जिंदाबाद!

Wednesday, 29 December 2010

आदि से अंत

मूल्य,
बहुत मायने रखता है जीवन में
ठीक जीवन-मूल्यों की तरह।
रोजमर्रा की जरूरतों की तरह।
रसोई से लेकर ओसारे तक
घर-आंगन की तरह।

मूल्य,
बहुत मायने रखता है जीवन में
ठीक वैचारिक-मूल्यों की तरह।
आचार और विचार की तरह।
घर से लेकर दफ्तर तक
सोच-संस्कार की तरह।

मूल्य,
बहुत मायने रखता है जीवन में
ठीक शाश्वत-मूल्यों की तरह।
गतिशील संवाद की तरह।
शुरू से लेकर आखिर तक
प्रतिबद्ध अवधारणाओं की तरह।

मूल्य,
बहुत मायने रखता है जीवन में
ठीक सामाजिक-मूल्यों की तरह।
हमारी मान्यताओं की तरह।
बड़ों से लेकर छोटे तक
प्यार-दुलार की तरह।

मूल्य,
बहुत मायने रखता है जीवन में
ठीक गणितीय-मूल्यों की तरह।
अंकों के खेल की तरह।
आमदनी से लेकर खर्च तक
हिसाब-किताब की तरह।

मूल्य,
बहुत मायने रखता है जीवन में
ठीक भौगोलिक-मूल्यों की तरह।
सुविधा और साधन की तरह।
यहां से लेकर वहां तक
सारे जहान की तरह।

मूल्य,
बहुत मायने रखता है जीवन में
ठीक संबंध-मूल्यों की तरह।
दोस्तों और दुश्मनों की तरह।
अच्छे से लेकर बुरे तक
बदलते रिश्ते की तरह।

मेरा सलाम

  तेल का ज्यादा दाम चुकाए जो दाल-भात सब महंगी खाए जो मेरा सलाम!   मध्यम वर्ग के बचत खातों को निम्न वर्ग के लथपथ हाथों को मेरा सल...