हमारे और तुम्हारे
अलग-अलग अस्तित्व,
एकाकार होते हम
अँधेरे में बिस्तर पर
संवेदना के
व्यापक गलियारे में
विचरते
अलग-अलग,
साथ-साथ.
कुलांचे भरती
तुम्हारी कल्पना
हमारे स्थिर मन को
अक्सर झकझोरती है.
वो तुम्हारा अस्तित्व है
मेरे और तेरे से
हम होने तक का
एहसास कराती है.
तुम्हारा चंचल मन
खुद की बेकरार सांसों
के बरक्स
मिलन का भाव जगती है.
और यहीं से पैदा होता है
शाश्वत प्यार.
Monday, 18 January 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
महंगाई डायन
बढ़े तेल के दाम, फिर छाने लगी महंगाई छाने लगी महंगाई, छूटेगी सबकी रुलाई डायन ने फिर दी है दस्तक, जाएगी खाय जाएगी खाय, हाय फिर छाने लगी महंगा...
-
पिता तलहटी में बचे तालाब के थोड़े से पानी भागती जिंदगी में बची थोड़ी सी जवानी दोनों को समेटकर सींचता हूं बड़े हो...
-
मानता हूँ कि सही आकर के लिए लोहे को खूब तपाया जाता है, फिर पीटा भी जाता है। छोटे-बड़े तरह-तरह के - हथोड़े का दर्द पिलाया जाता है। अच्छा होता...
-
क्रांति क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल सुना, घर छोड़ गया जो बेटा था वाचाल तर्पण तुम्हारे विचारों का कर दिया अवशेष फल्गु क...
1 comment:
अधेरे में और भी बहुत कुछ होता है। कुछ उन पर भी आपके विचार आएं।
Post a Comment