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भवेश चंद
Saturday, 12 December 2009
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पुल
बहुत छोटे से वक्त में आधारहीन हो गए हो पुल, तुम क्यों इतने अनुशासनहीन हो गए हो वहां बनने से पहले लुढ़के, यहां बनने के बाद रहगुजर की तरह ...
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पिता तलहटी में बचे तालाब के थोड़े से पानी भागती जिंदगी में बची थोड़ी सी जवानी दोनों को समेटकर सींचता हूं बड़े हो...
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मानता हूँ कि सही आकर के लिए लोहे को खूब तपाया जाता है, फिर पीटा भी जाता है। छोटे-बड़े तरह-तरह के - हथोड़े का दर्द पिलाया जाता है। अच्छा होता...
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क्रांति क्रांति, तुम कैसी हो, क्या हैं तेरे हाल सुना, घर छोड़ गया जो बेटा था वाचाल तर्पण तुम्हारे विचारों का कर दिया अवशेष फल्गु क...
1 comment:
good start
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