Saturday, 21 June 2025

 गजल

 

पूरी नजर से अधूरा घर देखता हूं।

गांवों में अधबसा शहर देखता हूं।

 

पूरे सपने बुने, अधूरे हासिल हुए।

फिर-फिर मैं अपने हुनर देखता हूं।

 

जिंदगी आधी कटी, पूरे तूफां आए।

कितनी ऊंची उठी लहर देखता हूं।

 

भरोसा की पूरी जमीं, फसल अधूरी।

किसने बो दिए यहां जहर देखता हूं।

 

अधूरा जान कर लिखी पूरी गजल।

कितना सही बैठा बहर देखता हूं।

सत्तांतरण   समाजवाद की अर्थी पर वंशवाद के पुष्प चढ़ाएं आओ राजपुत्र, तुम्हें साम्राज्यवाद का तिलक लगाएं   तुम तेजस्वी हो, तुम प्रदीप्त ...